Ultimate Realization of Truth

“One thing: you have to walk, and create the way by your walking; you will not find a ready-made path. It is not so cheap, to reach to the ultimate realization of truth. You will have to create the path by walking yourself; the path is not ready-made, lying there and waiting for you. It is just like the sky: the birds fly, but they don’t leave any footprints. You cannot follow them; there are no footprints left behind.”
Osho

परख

परख – एक कथा

एक मन्दिर में एक संन्यासी रहा करते थे। मंदिर के ठीक सामने ही एक वैश्या का मकान था। वैश्या के यहाँ रात−दिन लोग आते−जाते रहते थे। यह देखकर संन्यासी मन ही मन कुड़−कुड़ाया करता। उस संन्यासी ने यह हिसाब लगाने के लिए कि उसके यहाँ कितने लोग आते हैं एक−एक पत्थर गिनकर रखने शुरू कर दिये। एक दिन वह अपने को नहीं रोक सका और उस वैश्या को बुला भेजा। उसके आते ही फटकारते हुए कहा— ‟तुझे शर्म नहीं आती पापिन, दिन रात पाप करती रहती है। मरने पर तेरी क्या गति होगी?”

संन्यासी की बात सुनकर वेश्या को बड़ा दुःख हुआ। वह मन ही मन पश्चाताप करती भगवान से प्रार्थना करती अपने पाप कर्मों के लिए क्षमा याचना करती। बेचारी कुछ जानती नहीं थी। बेबस उसे पेट के लिए वेश्यावृत्ति करनी पड़ती किन्तु दिन रात पश्चाताप और ईश्वर से क्षमा याचना करती रहती। हमेशा की तरह, संन्यासी ने, जब कोई आता एक पत्थर उठाकर रख देता। इस प्रकार पत्थरों का बड़ा भारी ढेर लग गया तो संन्यासी ने एक दिन फिर उस वेश्या को बुलाया और कहा

“पापिन? देख तेरे पापों का ढेर? यमराज के यहाँ तेरी क्या गति होगी, अब तो पाप छोड़।”

पत्थरों का ढेर देखकर अब तो वेश्या काँप गई और भगवान से क्षमा माँगते हुए रोने लगी। अपनी मुक्ति के लिए उसने वह पाप कर्म छोड़ दिया। कुछ जानती नहीं थी न किसी तरह से कमा सकती थी। कुछ दिनों में भूखी रहते हुए कष्ट झेलते हुए वह मर गई।

क्या पता था, उस संन्यासी का भी समय आ चुका था, वह भी चल बसा।

सच के दरबार में जब पेशी हुई, तो संन्यासी को सज़ा सुनाने वालों की तरफ़ रखा गया और वेश्या को माफ़ करने वालों की तरफ़ । तब संन्यासी ने बिगड़कर कहा “तुम कैसे भूलते हो। जानते नहीं हो, मैंने कितनी तपस्या की है त्याग किया है”

सत्य बोले “हम सबकी असल जानते है। असल तो यह है वह वेश्या पापिन नहीं है पापी तुम हो। उसने तो अपने पाप का बोध होते ही पश्चाताप करके सच्चे हृदय से भगवान से क्षमा याचना करके अपने पाप धो डाले। अब वह मुक्ति की अधिकारिणी है और तुमने सारा जीवन दूसरे के पापों का हिसाब लगाने की पाप वृत्ति में, पाप भावना में जप तप छोड़ छाड़ दिए और पापों का अर्जन किया।

भगवान के यहाँ मनुष्य की भावना के अनुसार न्याय होता है। बाहरी बाने या दूसरों को उपदेश देने से नहीं। परनिन्दा, छिद्रान्वेषण, दूसरे के पापों को देखना उनका हिसाब करना, दोष दृष्टि रखना अपने मन को मलीन बनाना ही तो है।

संतों ने कहा है –

परख करोगे तो परख होगी। 

क्षमा करोगे तो क्षमा मिलेगी, हम अपने आपको भी क्षमा कर पायेंगे।

हम अपनी भावनाऐं पाप, घृणा और निन्दा में डुबाये रखने की अपेक्षा सद्विचारों में ही क्यों न लगावें? क्यों न अपनी चेतना को परमात्मा के चरणों ने लगायें।

या जग में कोई सुख न देखो

श्री हज़ूर स्वामी जी महाराज भी फरमाते है –

या जग में कोई सुख न देखो | गहो गुरु के बचननियाँ ||
दुःख के जाल फँसे सब मुरख | तू क्यों उन संग फंसननियाँ ||

स्वामी जी महाराज के भाव, जो मुझे समझ आता है – हमें लगता है कि इस दुनिया में लोग सुखी है लेकिन असलियत यह है कोई भी जग में सुखी है नहीं, सारे ही दुःख के जाल में फँसे जा रहे है, इसलिए आप समझते है हम क्यों उनके साथ फँसते जा रहे है, हमें तो हमें गुरु के वचनों पर चलना है।

सब घट मेरा साइयाँ

कबीर साहिब ने फ़रमाते है –

सब घट मेरा साइयाँ, सूनी सेज न कोय ||
बलिहारी वा घट्ट की, जा घट परघट होय||

भावार्थ – हर घट यानी शरीर के भीतर, मेरा ही परमात्मा (साइयाँ) निवास करता है।  कोई भी उससे (रब से) खाली नहीं है| जिसका मतलब यह है, परमात्मा का घर, कहीं बहार नहीं है, वह घर हम सब के अन्दर ही निवास करता है|

लेकिन उस घट यानी शरीर यानी जीव की बलिहार है, जिसके घट में वह (रब) प्रगट होता है।